कविता

तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा

शेष नहीं अब ज़िंदगी मे कुछ भी तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा हां मिज़ाज थोड़ा तल्ख है, आज थोड़ी सी रुसवाईयाँ भी हैं सुहाना मौसम है, दस्तूर है फिर भी, तुम भी तन्हा मैं भी तन्हा दूर क्यों बैठी हो, पास आओ नींद के दरिया में तुम मीठे सपनों की एक दीपक हीं जलाओ […]