देश की आत्मा का आत्मदाह !

अगर बात पूरे विश्व की करें तो मात्र भारत ही एक ऐसा देश है जहां की सबसे अधिक अबादी गांवो मे बसती है. और कहा भी जाता है कि गांव देश का शरीर होता है  और वहां के किसान उसकी आत्मा लेकिन एक सामान्य सा सवाल है कि अगर आत्मा ही ना रहे तो उस शरीर का क्या होगा ?

क्या आत्मा के बगैर शरीर का होना सम्भव है मेरे पास भी वही उत्तर है जो आप के पास है तो फिर इस आत्मा के साथ कोड़े वादे क्यों आपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए इन आत्माओं के साथ खिलवाड़ कब तक होता रहेगा ?

कोई  भी व्यक्ति आत्महत्या जैसा संगीन अपराध क्यो और किस परिस्थिति मे करता है मेरे हिसाब से तो इसका एक ही डेफिनिशन हो सकता है कि कोई भी व्यक्ति  आत्म हत्या करने का प्रयास तभी करता है जब वो थक जाता है हताशा और नीराशा उसे गले लगा लेती है

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तो क्या  आत्म हत्या ही सारे द्वार खोल देती है शायद नही  और अगर कुछ दोगले किस्म के नेताओं के कारण इसी तरह आत्मा रुपी किसान  आत्म हत्या करते रहे तो इन दोगले रुपी नेताओं का भला भी कैसे हो  सकता है क्योंकि इन्हें अपना राजनीतिक रोटी सेकने के लिए भी तो इसी आत्मा रुपी किसान की जरुरत होती है । तो फिर किसानो की सुरक्षा का जिम्मेवारी तो इन्हे बखुबी निभाना चाहिए  फिर वो चुक क्यों जाते है ?

भारत मे  कृषि के साधनो के विषय मे बात करे तो यहां कि कृषि मॉनसून पर अधिक निर्भर होती है जिस कारण यहां के किसानो को कभी खेती मे मुनाफा होता है तो कभी ऐसा नुकसान की वो कर्ज के तले इस कदर दब जाते है कि उनके पास एक मात्र विकल्प आत्महत्या बच जाता है और जिसे वो गले लगा लेते है ।

अगर राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकडों की बात करें तो 1996 से लेकर 2011 तक 9 लाख 50 हजार से भी अधिक किसान आत्म हत्या कर चुके है और वहीं सिर्फ 2014 की  आंकड़ा  की बात करें तो 131666 किसान आत्म हत्या कर चुके हैं

तो सवाल यह कि कब तक किसान आत्म हत्या करते रहेंगे और सरकार कब तक मुआवाजा की रोटी ठुंस कर इस मुद्दे को शांत करती रहेगी और आत्महत्या और मुआवजा का ये सिलसिला कब तक चलती रहेगी ? जरुरत है एक निष्कर्स की जिससे देश की आत्मा सुरक्षित हो सके और उसे किसी तरह की मुआवजे  की जरुरत ना पड़े ।

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Rahul Tiwari

राहुल तिवारी 2 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. वो इंडिया न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं.

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