पेट भरो योजना या फिर जेब भरो योजना

भारत सरकार यूं तो हर वर्ष एक नई योजना लाती है  जिससे देश वासियों को काफी हद तक लाभ भी होता है लेकिन कुछ योजनाएं ऐसी भी होती हैं जिसमे फायदा थोड़ा और नुकसान ज्यादा   होता है और ऐसे योजनाओं मे आय दिन  जान-माल और समय  का नुकसान होता रहता है पर कोई नही नुकसान सरकार का नही और नाहीं अमीरों  को होता है इसमे पिसती हैं तो मासुम और गरीब जिंदगीयां ।

आप सोंच रहे होंगे कि मै ये  क्या बोल रहा है तो मै आप को बता दूं कि मै बात कर रहा हुं सरकार द्वारा शुरु की गयी पेट भरने की योजना यानी मीड डे मील योजना की  । इस योजना को एक नाम और दिया जा सकता है  जेब भोरो योजना ।

क्या है पेट भरो योजना

मीड डे मील योजना  की शुरुआत  15 आगस्त 1997 को की गई थी और इस योजना को शुरु करने का एक मात्र उद्देश्य  वैसे बच्चों को प्रेरित करना था जिनका संबंध शिक्षा से दूर दूर तक नही  था, जो बच्चे  स्कूल अपने पेट भरने  की वजह से नही जा पाते थे क्यों कि उन्हे अपना पेट भरने के लिए खेतों या होटलों  में मजदूरी करना पड़ता था जिस कारण वो शिक्षा से वंचीत रह जाते हैं ।

साथ ही इसके पीछे  एक और वजह थी , देश मे कुपोषण से जुझ रहे  गरीब बच्चों को हेल्दी भोजन उपलब्ध करा कर देश मे कुपोषीत बच्चों की संख्या को कम करना था ।

mid day meal

 

इस योजना को पहले कक्षा 1 से 5 तक मे लागू किया गया  था और पहले पड़ाव मे 2408 बलॉकों मे शुरु की गई फिर 2002 मे सारे प्राथमीक स्कूलों मे जहां एक से पाँच तक की पढ़ाई होती थी वहां इसे  अनिवार्य कर दिया गया और फिर बाद मे कक्षा एक से आठ तक के लिए अनिवार्य कर दिया गया ।

पेट भरो योजना जेब भरो योजना कैसे बन गया

भारत सरकार हर महीने  देश के हर सरकारी स्कूलों मे जहां  1 से 8 तक की पढ़ाई होती है वहां संतुलीत अहार मुहैया कराती है जिसमे प्राथमिक बच्चों के लिए 100 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से भोजन उपलब्ध कराती है और उच्च प्राथमिक  बच्चों के लिए 150 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से भोजन उपलब्ध कराती है अगर भोजन मेनू की बात करें तो उसमे सोमवार के दिन रोटी ,सोयाबीन एंव दाल की बड़ी युक्त सब्जी होती है

वहीं मंगलवार को दाल-चावल ,वुधवार को तहरी ( खीचड़ी ) और दूध , गुरुवार को दाल-रोटी शुक्रवार तो तहरी और शनीवार को चावल सोयाबीन युक्त सब्जी देने का प्रावधान है ।

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लेकिन अगर हकीकत  की बात करें तो ज्यादा दिन सिर्फ तहरी ही दी जाती जिसमे दाल की मात्रा काफी कम होती है रोटी और दूध की बात करें तो बच्चों के थाली से तो गायब ही रहता है ।

सरकार द्वारा दिए गये  चावल और दाल को डीलर  के यहां ही बदल कर सस्ती चावल दाल उपलब्ध कराई जाती है बाकि का जो पैसा बचता है वो डीलर से लेकर शिक्षकों मे बांट ली जाती है  और सरकार का संतुलित  आहार  देने का वादा धुल चाटती नजर आती है और वर्ष भर मे करोड़ो रुपये का घोटाला भी होता है ।

साथ ही आय दिन यह भी सुनने को मिलता  है कि मीड डे मील खाने से कई बच्चो की मौत भी हो जाती है तो यह योजना कैसे लाभकारी सिद्ध हुआ ?

मेरे हिसाब से बच्चों की थाली वैसी ही है जैसा की कल था लेकिन शिक्षकों से लेकर डीलरों तक की जेब वैसी नहीं है जैसा कि कल था उनकी जेब  हरी जरुर हो जाती है ।

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Rahul Tiwari

राहुल तिवारी 2 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. वो इंडिया न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं.

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