Detailed Analysis: टिड्डियों का कहर जारी, भारत में हमले का पुराना है इतिहास

एक तरफ देश मे कोरोना वायरस के कारण महामारी फैली है तो वहीं दुसरी ओर एक नई आफ़त ने देश का रुख़ कर लिया है. यह ना कोई तूफ़ान है, ना किसी तरह की मानव निर्मित आपदा, यह कीटों अर्थात टिड्डियों का झुंड़ है जो न केवल आम इंसान बल्कि सरकार के लिए भी सिर दर्द बने बैठें हैं.

आइये जानते हैं ये टिड्डियों का दल है क्या और क्यों यह एक भयानक खतरा बना पड़ा है:-

बहुत से लोगों के मन मे यह सवाल होगा यह टिड्डा होता क्या है तो आपको बताते चलूँ कि टिड्डी को Locust भी कहते हैं और यह ऐक्रिडाइइडी (Acridiide) परिवार के ऑर्थाप्टेरा (Orthoptera) गण का कीट है. हेमिप्टेरा (Hemiptera) गण के सिकेडा (Cicada) वंश का कीट भी टिड्डी या फसल डिड्डी (Harvest Locust) कहलाता है. इसे लधुश्रृंगीय टिड्डा (Short Horned Grasshopper) भी कहते हैं. संपूर्ण संसार में इसकी केवल छह जातियाँ पाई जाती हैं. यह प्रवासी कीट है और इसकी उड़ान दो हजार मील तक पाई गई है.

अब सवाल यह उठता है यह आयीं कहा से- पाकिस्तान के रास्ते टिड्डियों का दल भारत पहुंचा है

पिछले 20 वर्षों से भारत में टिड्डियों का हमला होता रहा है. पिछले साल भी इसने भारत में भारी नुकसान पहुंचाया था. देश में अब तक सबसे बड़ा टिड्डियों का हमला साल 1993 में हुआ था. बाद के वर्षों में इससे बड़ी संख्या में टिड्डियों का दल आता रहा है, लेकिन सरकार की मुस्तैदी की वजह से नुकसान ज्यादा नहीं हुआ. इस बार ये टिड्डियां ईरान के रास्ते पाकिस्तान से होते हुए भारत पहुंची हैं. सबसे पहले इन्होंने पंजाब और राजस्थान में फसलों को नुकसान पहुंचाया और अब यह दल झांसी पहुंच गया है. टिड्डियों के इस दल ने पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश में फसलों को तबाह कर दिया है. साथ ही टिड्डी दल का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है.

उड़ने वाले वयस्कों में परिपक्व होने से पहले टिड्डियां कई चरणों से होकर गुजरती हैं. इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी बिंदु पर यदि अनुकूल परिस्थितियां हों तो वे झुंड में बदल सकती हैं. उनके व्यवहार और शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वे बनी रह सकती हैं या फिर उलटा भी हो सकता है. आइए, इनके जीवन चक्र पर डालते हैं एक नजर:

एक दिन में कई मीलों का सफर: झुंड में यह एक दिन में 81 मील या इससे अधिक की दूरी तय कर सकती हैं. 1954 में एक झुंड ने उत्तर पश्चिम अफ्रीका से ब्रिटेन तक की उड़ान भरी. वहीं 1988 में पश्चिम अफ्रीका से कैरेबियन तक का सफर तय किया। इस दौरान वे महज 10 दिनों में 3100 मील तक पहुंच गई.

टिड्डियों के भारी संख्या में पनपने का मुख्य कारण वैश्विक तापवृद्धि के चलते मौसम में आ रहा बदलाव है. विशेषज्ञों ने बताया कि एक मादा टिड्डी तीन बार तक अंडे दे सकती है और एक बार में 95-158 अंडे तक दे सकती हैं। टिड्डियों के एक वर्ग मीटर में एक हजार अंडे हो सकते हैं. इनका जीवनकाल तीन से पांच महीनों का होता है. नर टिड्डे का आकार 60-75 एमएम और मादा का 70-90 एमएम तक हो सकता है.

टिड्डियों को भगाने के परंपरागत उपायों में थाली बजाना, खेतों में धुंआ करना करना शामिल हैं. टिड्डियों का दल आवाज के कंपन को महसूस करता है. इस कारण आजकल इन्हें भगाने के लिए डीजे का भी प्रयोग किया जाने लगा है. यह आवाज को दूर से भांपकर अपना रास्ता बदल लेते हैं अथवा खेतों से उड़कर दूर चले जाते हैं.

इसके अतिरिक्त, फसलों को टिड्डी दल के हमले से बचाने के लिए हेस्टाबीटामिल, क्लोरफाइलीफास और बेंजीएक्सटाक्लोराइड का खेतों में छिड़काव करना चाहिए. साथ ही ड्रोन से रसायन का छिड़काव किया जा रहा है. वहीं सरकारी स्तर पर भी इस तरह के प्रयास किए जाते हैं. हालांकि इतने बड़े पैमाने पर ऐसे उपाय करना काफी मुश्किल काम है. वहीं खाली पड़े खेतों में टिड्डी दल अंडे देता है। जिन्हें नष्ट करने के लिए खेतों में गहरी खुदाई की जानी चाहिए और फिर इनमें पानी भर देना चाहिए.

टिड्डियों का खौफ़ थमने का नाम ही नहीं ले रहा, सूबे में दस्तक देने वाले टिड्डी दल को रोकने के लिए मध्य प्रदेश बॉर्डर पर ड्रोन से निगरानी के बीच शनिवार को लखनऊ में टिड्डियों ने हमला बोल दिया। यह दल फसलों को नुकसान नहीं पहुंचा पाया लेकिन कई पेड़ पौधों को चट कर दिया. जिला कृषि रक्षा अधिकारी धनंजय सिंह ने बताया कि शनिवार को सूबे के मध्य प्रदेश बार्डर के शिवपुरी इलाके में ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक का छिड़काव कर निगरानी की जा रही है. लखनऊ में आए दल को लेकर अलर्ट रहने के निर्देश जारी किए गए हैं.

मध्‍य प्रदेश में टिड्डियों के हमले जारी

मध्य प्रदेश के कुछ अंचलों में अब भी टिड्डी दलों का फसलों व पेड़-पौधों पर हमला जारी है. रविवार को गुना, सिवनी, रीवा, सतना व सीधी जिलों में लाखों की संख्या में पहुंची टिड्डियों ने धावा बोला. उन्होंने खेतों में सब्जियों व अन्य फसलों व पेड़-पौधों की पत्तियों को चट कर दिया। उन पर फायर ब्रिगेड की मदद से कीटनाशकों का छिड़काव किया गया, लेकिन 20 से 40 फीसद ही मारी गई. बची टिड्डियां अब भी नुकसान पहुंचा रही है.

छत्तीसगढ़ में किसान परेशान

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर दो दिन पहले तक मंडरा रहा टिड्डियों का एक दल हवा के साथ छत्तीसगढ़ में भी पहुंच गया है. कोरिया जिले में टिड्डियों ने फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है. बताया जा रहा है कि शनिवार को टिड्डियों का दल मध्‍य प्रदेश के सीधी की ओर बढ़ता देखा गया, लेकिन हवा का रुख बदलने से छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश कर गया.

कृषि विभाग का कहना है कि टिड्डियों के बड़े दल में फिलहाल बिखराव हो गया है. इस समय जिले में तेज गर्म हवाएं चल रही हैं, जो इस दल को जिले की सीमा से दूर ले जा सकती हैं.

इन सब से एक बात तो साफ हो गई है अगर वक़्त रहते इनपर काबू नहीं पाया गया तो हमारे किसानों तथा हमारी जेबों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.

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