तलाक और हलाला के नाम पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण का जिम्मेदार कौन ?

ये तो सच है इस देश में जितनी संख्या मुस्लिम महिलाओं के रहनमाओं की है उतनी हिंदू महिलाओं के रहनुमाओं की भी नहीं है, क्योंकि तीन तलाक हो या हलाला, महिलाओं की शिक्षा हो या आजादी, सभी मामलों में हिंदुओं को लगता है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका हक नहीं मिल रहा, इसीलिए तो रुक रुककर आवाज़े आती रहती हैं, पीएम से लेकर कई राज्यों के सीएम तक मुस्लिम महिलाओं के नाम पर चुनावी प्रचार करते हैं, और कमाल ये है इसी के दम पर विजय भी पा लेते हैं, सवाल ये है क्या मुस्लिमों में कोई ऐसा लीडर नहीं है जो अपनी औरतों की हिफाजत कर सके, और जो उन्हें उनका हक दिला सके, तो जवाब है “नहीं”! क्योंकि हम यानी मुस्लिम पुरुष शरियत का हवाला देकर मुस्लिम महिलाओं से उनका हक छीन लेते हैं .

मैं एक मुसलमान हूं और सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक के फैसले से बेहद खुश हुआ हूं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है और इस फैसले से सच में एक सच्चा मुसलमान खुश हुआ है. इस्लाम में जितना हक़ पुरुष को है उतना ही महिलाओं को है. जो खुश नहीं हुआ वो ऐसे लोग थे जो तलाक और हलाला को धंधा बनाए हुए थे. एक सच ये भी है जब से तलाक पर फैसला आया है तलाक देने वाले लोग गायब ही हो गए हैं, पहले के मुकाबले अब ना के बराबर मामले सामने आ रहे हैं, या एक समय वो था जब तलाक का मतलब ही बदल दिया गया था, तलाक खेल बन चुका था, औरतों पर मर्दों के जुल्म की शह बन चुका था, ये उस मानसिकता का सुल्तान बन चुका था, जो महिलाओं को अपने जूते का तल्ला समझते हैं.

लेकिन अंधेरे के बाद सूरज उगता है… वो सूरज निकला है और तलाकनुमा काले बादलों को चीर कर धरती के कोने कोने में जा पहुंचा है और आज मुस्लिम महिलाओं के अंदर से तालाक नाम का डर मिटता हुआ मैं खुद देख रहा हूं। एक और बात हलाला की, इसे तो कुछ लोगों ने व्यापार बना दिया है, वो व्यापार जहां सिर्फ मुनाफा ही मुनाफा होता है। बड़े-बड़े मुस्लिम मुहल्लों में जाईयेगा तो हलाला की के नाम पर दुकानें खुली मिल जाएंगी। कहने का मतलब ये है हलाला जायज़ है, कुरान और शरियत में इसका तरीका भी बताया गया है। लेकिन इसी के नाम पर व्यापार करने वालों ने दीन इमान को सरे बाजार नीलाम किया, इन्ही की वजह से इस्लाम पर उंगलियां उठनी शुरु हुईं.

हलाला के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का सौदा किया गया, अपनी रातें रंगीन करने के लिए धर्म की आड़ में अस्मत को तार तार किया गया. मैंने जिस्मानी बाज़ार के वो सरताज देखे हैं जो पैसों के लिए खुद को बेचते हैं. धर्म के बेचते हैं, कर्म को बेचते हैं, अपने इमान और वतन को बेचते हैं. बेगैरत और बेहयाई की वो तस्वीर देखी है जिसे देखकर खुदा भी इन्हे दुनिया में भेज कर अफसोस करता होगा, अफसोस करता होगा उस दिन का जिस दिन इनके कानों में पहली आजान पढ़ी गई थी, अफसोस करता होगा उस दिन का जिस दिन इन्होंने कलमा पढ़ा था. वो रोता होगा प्यारे पाक साफ दीन और इस्लाम पर उठती उंगलियां देखकर, वो रोता होगा निकाह में व्यापार देखकर, वो रोता होगा इस्लाम का बाज़ार देखकर, वो रोता होगा रिश्तों में तकरार देखकर, वो रोता होगा मस्जिद, मदरसों में भ्रष्टाचार देखकर… वो रोता होगा तुम्हारी रहनुमाई देखकर… वो रोता होगा तुम्हारी हवस की परछाई देखकर…

अब तक पढ़ते पढ़ते शायद आप कन्फ्यूज़ हो गए हों, लेकिन ये बताना इसलिए जरूरी था तलाक और हलाला के कारोबार में मुस्लिम महिलाएं को क्या  मिला है, हमने उन्हें कहां पहुंचा दिया हैं, और मुस्लिम रहनुमा इन्हें इनका हक दिलाने के लिए कितना काम कर रहे हैं, उसी को अपने नजरिए से मैंने लिख दिया है, वो जो ऊपर हमने जिक्र किया था मुस्लिम महिलाओं के लिए चिंतित हिंदू रहनुमाओं का, तो ये हिन्दू रहनुमा भी हम मुस्लिमों के कारण पैदा हुए हैं.

इस्लाम में टीवी देखना जायज नहीं है, इस्लाम में तस्वीर खिंचवाना जायज नहीं है, इस्लाम में बहन और रिश्तेदार से अगल दूसरी महिला को देखना भी हराम है, लेकिन दूसरों को ये तालीम देने वाले मुस्लिमों के लीडरों की खुद इसी बाजार में दुकान है, वो ये सब करते हैं, और डंके की चोट पर करते हैं, दीन के लिए कहते बहुत कुछ हैं, लेकिन करते सिर्फ दुनिया की हैं, तो इन्ही से मेरी गुजारिश है खुदा के वास्ते इस्लाम को बदनाम ना करो…खुदा की जागीर को सरेआम नीलाम मत करो…जैसा है मेरे इस्लाम इसे ऐसा ही रहने दो. इसकी आड़ में धंधा हराम मत करो.

 By: Ahzaz Badar

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *