कविता: गुड़िया

गुड़िया

माँ मेरी आवाज सुन तु , माँ मैं तुझे पुकार रही हूँ |
माँ मुझे नहीं पता की मेरे साथ क्या हुआ
पर माँ मुझे बहुत ही दर्द हुआ
माँ मैं तो जानती भी नहीं जो मेरे साथ हुआ
एक ने मुझे बेरहमी से छुआ तो एक ने रस्सी से बांध दिया
मैं पुकार रही थी तब भी तुझे ही माँ
जब ये घिनोना काम मेरे साथ हुआ
माँ मेरा क्या कसूर था जो ये मेरे साथ हुआ
मेने तो छोटे कपडे भी नहीं पहने थे फिर क्यों ये मेरे साथ हुआ
मैं तो रात में बहार भी नहीं निकली थी फिर भी ये मेरे साथ हुआ
माँ मेरी खेलने कूदने की उम्र में ये क्या मेरे साथ हुआ
माँ मुझे जकड़ लिया गया ,क्या बताऊ क्या दर्द मेने सहा
माँ मुझे तो पसंद था गुड़ियों से खेलना
पर उन जालिम वेशियो ने तो गुड़िया मुझे ही समझ लिया |

 

 

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