चंद्रशेखर तिवारी कैसे बन गए ‘आज़ाद’, काफ़ी रोचक है कहानी

चंद्रशेखर आज़ाद किसी पहचान के मोहताज नही हैं। उनकी साहस को हर भारतीय आज भी याद रखता है। चंद्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1903 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव, अलीराजपुर जिले में हुआ था जो कि आज वर्तमान में चन्द्रशेखर आज़ादनगर के रूप में जाना जाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद का वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। उनके नाम के आगे ‘आज़ाद’ लगने की कहानी भी काफ़ी रोचक है । कहा जाता है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जलियांवाला बाग नरसंहार ने देशवासियों को दुखी कर दिया था।

महात्मा गांधी ने इस घटना के विरोध में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया था। वर्ष 1921 में काशी में छात्रों का एक समूह विदेशी कपड़ों की दुकान के बाहर धरना दे रहा था। इसी दौरान पुलिस आई और सभी को लाठियों से पीटने लगी। 15 वर्षीय छात्र चंद्रशेखर तिवारी को गुस्सा आया और उन्होंने दरोगा को पत्थर मार दिया। पुलिस ने चंद्रशेखर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया । मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा तो उन्होंने आजाद बताया। वहीं मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर जेल बताया। मजिस्ट्रेट ने किशोर चंद्रशेखर के तेवर देख कर 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी।

शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में बेंत की टिकठी से बांध कर आजाद को जेलर ने कोड़े मारना शुरू किया तो हर कोड़े पर वह “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” कहते थे। किशोर चंद्रशेखर जेल से बाहर आए तो उनकी बहादुरी और साहस का किस्सा काशीवासियों की जुबान पर था। इसके बाद ज्ञानवापी में हुई सभा में चंद्रशेखर तिवारी का नामकरण चंद्रशेखर आजाद किया गया।

आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी और माँ जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसी वजह से किशोरावस्था में पढ़ाई के लिए उन्हें काशी भेजा गया था। आज़ाद बचपन से कौशल थें। उनका स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव बचपन से ही देखा गया था, बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। सेंट्रल जेल में कोड़े मारे जाने की घटना के बाद आजाद पढ़ाई के दौरान ही काशी में क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए थे। काशी में मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आजाद आए और निशानेबाजी में पारगंत होने के कारण सशस्त्र क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए। क्रांतिकारियों का यह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था।

1922 में चौरीचौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो कांग्रेस से आजाद का मोहभंग हो गया था।
वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके बाद सन् 1927 में ‘बिस्मिल’ के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स की हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।

एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ 3 ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की।
11 फ़रवरी 1932 को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया।

गणेश शंकर विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और २० फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

काकोरी कांड, अंग्रेज अफसर जेपी सांडर्स की हत्या और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले आजाद इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों से लिखें गए हैं ।

क्रूर बख्तियार खिलजी की मौत लिखने वाले असम के हिन्दू राजा पृथु देव की अनकही कहानी

लेटेस्ट खबरों के लिए हमारे facebooktwitterinstagram और youtube से जुड़े 

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *