किस्सा: जब भारत ने जीता था अपना पहला टेस्ट मैच, 20 सालों तक करना पड़ा था इंतजार

चेन्नई का मैदान भारतीय क्रिकेट टीम के लिए अब तक सबसे लकी मैदानों में रहा है। भारत ने यहीं पर अपनी पहली टेस्ट मैच की जीत हासिल की थी। चेन्नई की इसी मैदान पर भारत ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ कई बार बड़ी जीत पाई है। तो आईये आपको बताते हैं की भारत की पहली टेस्ट मैच के जीत की कहानी, जिसकी आज 69वीं वर्षगांठ है।

ये मैदान हमेशा से ही भारतीय क्रिकेट और भारतीय खिलाडियों के लिए बहुत खास रहा है। भारतीय क्रिकेट की बहुत सी अच्छी और खास यादें इस मैदान के साथ जुड़ी रही हैं। दरअसल भारत ने टेस्ट क्रिकेट में 1932 में आगाज किया था। इस जीत के लिए भारतीय क्रिकेट टीम को 20 सालों तक इंतजार करना पड़ा था. ऐसे में ये जीत हमेशा के लिए भारतीय क्रिकेट में यादगार लम्हों में सुमार रहा है और साथ ही चेन्नई का मैदान भी उतना ही लकी रहा.

आपको बता दें की उस वक़्त भारतीय टीम की अगुवाई विजय हजारे कर रहे थे और मैदान था चेन्नई का चेपक स्टेडियम. जानकर हैरानी होगी की तब भारतीय टीम को एक मैच के मुश्किल से 250 रुपए मिला करते थे. हालाँकि अब तो भारतीय क्रिकेटर को एक टेस्ट मैच खेलने की एवज में 15 लाख रुपए तक मिलते हैं, लेकिन वो जमाना एकदम अलग था.
विजय हजारे ने उस मैच में गजब की कप्तानी की थी जिसे लेकर आज तक क्रिकेट प्रेमी हजारे की तारीफ करते नहीं थकते. उस मैच में भारत की ओर से दो शतक लगे थे लेकिन जीत के असली हीरो विनोद मांकड़ बने, जिन्होंने अपनी उम्दा गेंदबाजी से धाक जमा दी थी। सही मायनों में वो पहले स्टार आलराउंडर थे, जो उन दिनों चरम पर थे।

भारतीय टीम में उस वक़्त लाला अमरनाथ भी थे, जो जबरदस्त आलराउंडर थे। दत्तू फडकर भी आलराउंडर क्रिकेटर के तौर पर टीम में शामिल थे। विजय हजारे उस जमाने के बेहतरीन बल्लेबाज माने जाते थे, युवा पॉली उमरीगर ने खुद को गजब के ऑफ स्पिनर के तौर पर टीम में स्थापित कर लिया था जो अक्सर बॉलिंग की शुरुआत भी करते थे.

कैसी थी पहली टेस्ट मैच की टीम:

उस समय भारतीय टीम युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का परफेक्ट मिक्सचर थी। पंकज राय, मुश्ताक अली जैसे युवा खिलाड़ी भारतीय टीम का हिस्सा थें. हालांकि 1952 में इंग्लैंड की जो टीम भारत आई, उसे कमोवेश कमजोर टीम माना गया क्योंकि उस टीम में उनके कई जाने माने क्रिकेटर नहीं आए थे, जिसमें लेन हटन, सिरील वाशब्रुक, डेनिस काम्पटन, बिल एल्ड्रिच, एलेक बेडसर और जिम लेकर जैसे क्रिकेटर शामिल थे। बता दें कि मद्रास टेस्ट में आखिरी मैच था और उस मैच में डोनाल्ड कार ने कप्तानी की क्योंकि टीम के नियमित कप्तान नाइगल हावर्ड चोटिल हो गए थे.

टेस्ट मैच में मिलते थें रेस्ट डे !

आपको बता दें की टेस्ट मैच की शुरुआत हुई इंग्लैंड के टॉस जीतने के साथ। कहते हैं क शुरूआती विकेट आमतौर पर बॉलर्स के लिए कुछ ख़ास मददगार नहीं रहें. इंग्लैंड की टीम आराम से रन बना रही थी. इसके बाद भी मांकड की कसी हुई गेंदबाजी के चलते पहले दिन के खेल के बाद इंग्लैंड का स्कोर था 05 विकेट पर 224 रन.

टेस्ट मैच शुरू होने के दूसरे दिन ही किंग जार्ज पंचम का निधन हो गया जिसकी वजह से मैच नहीं हो पाया, और उस दिन को रेस्ट डे घोषित कर दिया गया. बेहतरीन बात यह है की तब के समय में टेस्ट मैचों में एक दिन रेस्ट का भी हुआ करता था.और यह रेस्ट डे की परंपरा 70 के दशक तक चली। लेकिन 80 के दशक में रेस्ट डे को खत्म कर दिया गया. खैर जब मैच दोबारा शुरू हुआ तो मांकड की शानदार गेंदबाजी से इंग्लैंड टीम का लोअर आर्डर एकदम से उखड़ गया.

मांकड़ ने उस पारी में 55 रन देकर आठ विकेट लिए थें, उनकी गेंदें खतरनाक तरीके से आफ स्टंप पर आ रही थीं, अब ये देखना था कि भारतीय बल्लेबाज आगे क्या करते हैं… वीनू मांकड़ को इस बात के लिए दाद दी जाती थी कि उन्होंने बैटिंग को सपोर्ट करने वाले विकेट पर इतनी सटीक गेंदबाजी की थी।

और ऐसे ही मांकड़ ने अपनी शानदार गेंदबाजी के साथ आखिरी विकेट पर अपने जीत का परचम लहराते हुए भारतीय क्रिकेट टीम के लिए एक ऐतिहासिक दिन बना दिया। ये भारतीय क्रिकेट टीम के लिए टेस्ट मैच की पहली पहली और ऐतिहासिक जीत थी।दर्शकों में ख़ुशी की लहर चल पड़ी थी और देश में क्रिकेट प्रेमियों के लिए जैसे कोई त्यौहार सा माहौल बन गया था। दो दशक के इंतजार के बाद भारतीय टीम ने एक पारी और 08 रनों से जीत हासिल की थी।

वीनू मांकड़ ने इस मैच में कुल मिलाकर 12 विकेट लिये , जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है की उस सीरीज में मांकड़ किस कदर के सफल खिलाड़ी थे। अनुभवियों का मानना है कि इस ऐतिहासिक जीत ने भारतीय क्रिकेट में नया आत्मविश्वास पैदा करने का काम किया था।

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