सियासी सफ़र: करोल बाग की झुग्गियों में चाय बेचने वाला सज्जन कुमार कैसे बना लोकसभा सांसद

1984 सिख विरोधी दंगे पर कोर्ट के आये फैसले से कांग्रेस खेमे में मातम पसरा हुआ है । यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस 3 राज्यों में जीत का जश्न मना रही थी । 1984 दंगे में भड़काऊ भाषण देने, दंगा फैलाने और हत्या करने के आरोप में कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है । आज हम आपको बताएंगे कि इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देने वाला सज्जन कुमार ने कैसे राजनीतिक गलियारों में खुद को मजबूत बनाया और कैसे वो राजनीतिक सीढियां चढ़ा ।

शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि सज्जन कुमार कभी करोल बाग के प्रसाद नगर की झुग्गियों में चाय बेचा करता था। वो चाय की एक छोटी से रेड़ी लगाया करता था वहां । जब तत्कालीन सरकार ने उन झुग्गियों को वहां से शिफ्ट करके मादीपुर में बसाया तो सज्जन कुमार भी अपनी चाय की ठेली ले कर वहां पहुंच गए और उन्होंने वहां चाय के साथ-साथ मिठाईयों की दुकान भी खोल ली । और वहीं से उनका  गोल्डन पीरियड शुरू हो गया । मानो सरकार ने प्रसाद नगर की झुग्गियों को नहीं सज्जन कुमार के किस्मत को शिफ्ट कर दिया हो और उनके भाग्य का सितारा यहीं से चमका और चाय की ठेली से पहुंच गए लोकसभा में ।

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उस समय कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में चौधरी हीरा सिंह जाट का नाम शामिल हुआ करता था, वो दिल्ली के सबसे कद्दावर कांग्रेसी नेता एचकेएल भगत के करीबी हुआ करते थे और सज्जन कुमार चौधरी हीरा सिंह के । ऐसे में एचकेएल भगत के हीरा सिंह का करीबी होना सज्जन के लिए फायदे मंद रहा । हीरा सिंह ने एचकेएल भगत से सिफारिश कर पहली बार दिल्ली नगर निगम का टिकट दिलवाया और फिर क्या था सज्जन कुमार की किस्मत ऐसे चमकी की उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।

संसद तक पहुंचे 

1977 में देश भर में चली जनता पार्टी की आंधी में कांग्रेस की नाव डूबने लगी । दिल्ली में भी कांग्रेस के हाथों में केवल पतवार ही राह गया था । इसके बाद पार्टी का कमान संजय गांधी ने संभाला और 1980 में संजय गांधी ने उप चुनाव का टिकट बाहरी दिल्ली से सज्जन कुमार को दिया । सज्जन कुमार संजय गाँधी के उम्मीदों पर सौ प्रतिशत खड़े उतरे और बाहरी दिल्ली का सीट जीत कर कांग्रेस की झोली में डाल दिया लेकिन 1984 के सिख दंगे के बाद इनका ही टिकट कट गया । लेकिन एक बार फिर  उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया और वो 1991 में सांसद चुन लिए गए इसके बाद 2003 में लोकसभा के लिए बाहरी दिल्ली से टिकट मिला और वहां भी अपना परचम लहराने में सफल रहे ।

2009 में फिर पार्टी ने उन्हें बाहरी दिल्ली से प्रत्याशी बनाया लेकिन एक सिख पत्रकार के द्वारा गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंके जाने के बाद पार्टी ने उनका टिकट काट दिया । आपको बात दें कि जिसने सज्जन कुमार को यहां तक का सफर तय करवाया उससे ज़्यादा विधानसभा की सीटें सज्जन कुमार की झोली में थी । उस समय के सबसे कद्दावर नेताओं के लिस्ट में शुमार एचकेएल भगत के पास 20 विधानसभा सीटें थीं तो सज्जन कुमार के पास 21 । ऐसे में कोई दो राय नहीं कि सज्जन कुमार का भी बाहरी दिल्ली में दबबदबा रहा । पार्टी ने इन्हें दिल्ली के हर फैसले में शामिल किया लेकिन सिख दंगे में नाम आने के बाद पार्टी ने इन्हें बड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया ।

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Rahul Tiwari

राहुल तिवारी 2 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. वो इंडिया न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं.

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